मन की बेचैनी — सत्य का प्रमाण

मन की बेचैनी — सत्य का प्रमाण

नवद्वारे पूरे देही हँसो लेलायते बहि:। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥

वह परम-पुरुष प्रकाश के रूप में नवद्वार वाले देह रूपी नगर में अंतर्यामी होकर स्थित है। वही इस बाह्य-स्थूल जगत में लीला कर रहा है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १८)

आचार्य प्रशांत: नवद्वार तो समझते ही हो। शरीर में जो नौ निकास-छिद्र होते हैं वो नवद्वार हो गए। जिन नौ जगहों से ये…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org