मन किसे नहीं जान सकता?

मन किसे नहीं जान सकता?

यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।

यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥

(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 1)

जिसने भी ये सोच लिया कि वो जानता है, उसके लिए ये बात तय है कि वो नहीं जानता।

प्रश्नकर्ता: जैसे कहा गया था की मैं जनता हूँ कि मैं कुछ नहीं जनता।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org