मन कामवासना में इतना लिप्त क्यों?

मन कामवासना में इतना लिप्त क्यों?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन का अधिकांश समय कामवासना में व्यतीत किया है। किशोरावस्था से लेकर अब तक कामवासना से मन ग्रसित रहा। जीवन की सारी व्यग्रता, उदासी या मन की किसी भी व्यग्र कर देने वाली स्थिति में वासना को ही द्वार बनाया खाली होने के लिए या कुछ क्षणों की शांति पाने के लिए। कुछ सालों से काम ऊर्जा क्षीण- सी प्रतीत हो रही है लेकिन मन से उतर नहीं रही है। बल्कि इसका क्षीण होना ही और व्यग्र करता है, डराता है। आचार्य जी, मन काम को, वासना को, इतना महत्व क्यों देता है?

आचार्य प्रशांत: तुम बताओ? कुछ तो करोगे न जीने के लिए? चौबीस घंटे मिले हैं, शरीर, हाथ, अन्य अवयव मिले हैं तो कुछ तो होगा। कुछ सार्थक नहीं होगा तो कुछ निरर्थक होगा।

अच्छा बताओ वो कालिमा कहाँ से आई ज़मीन ओर (सामने पड़ रही पेड़ की छाया के बारे में पूछते हुए) वो देखो! अनु, अनमोल के पीछे से शुरू हो रही है और लम्बी खिंच रही है वो कहाँ से आई? बोलो, वो काली छाया कहाँ से आई?

प्रश्नकर्ता: वृक्ष से।

आचार्य प्रशांत: वृक्ष स्वयं तो प्रकाशित है। ये काली छाया कहाँ से आई? वृक्ष तो कहीं से मुझे अंधकार में नहीं दिखता, ये काली छाया कहाँ से आई? जहाँ रोशनी नहीं है वहाँ ये (काली छाया) है। वो कहीं से थोड़े ही आई है। इसी तरह तुम्हारे जीवन में जब सत्य नहीं होगा, राम नहीं होंगे तो ये होगा- कालिमा! काम!

अभी यहाँ बैठे हो, मुझे सुन रहे हो, इस समय थोड़े ही कामोत्तेजित हो या हो? अभी तो शांत बैठे हो न? क्योंकि किसी सार्थक कृत्य में पूरे तरीके से संलग्न हो।

जीवन को वो नहीं दोगे जिसके लिए जीवन बना ही है तो जीवन पचास तरह के उपद्रवों से भर जाएगा। बात बहुत ज़ाहिर और छोटी सी है।

आ रही है समझ में?

वासना वगैरह की औकात क्या है? तुम ऐसे लिखते हो जैसे कितना बड़ा जंजाल हो, कितनी बड़ी ताकत हो तुम्हारे खिलाफ। उनमें क्या ताकत है? इस काली छाया में क्या ताकत है? ज़रा- सी रोशनी पड़ती है, मिट जाती है ये तो मुँह छुपाती फिरती है कि कहीं मुझे प्रकाश देख न ले। ये तो नज़र भी नहीं मिला सकती। अंधेरे में रोशनी से नज़र मिलाई और- मिटा!

तुम उससे छुपते क्यों फिर रहे हो जो असली है? ये मत कहो कि काम मुझ पर क्यों सवार है? तुम जवाब दो इस बात का कि- तुम उससे क्यों भाग रहे हो जिसके साथ तुम्हें होना ही है, जो स्वयं तुम्हें आमंत्रित करता है, जिसको पाने के दसों द्वार सदैव खुले ही हुए हैं, तुम उससे भाग क्यों रहे हो? उससे भागोगे तो ये सब कांड शुरू होंगे- काम चढ़ेगा, बेचैनी चढ़ेगी, ऊब चढ़ेगी, व्यर्थ ऊर्जा का क्षरण होगा। कहीं लपटोगे-झपटोगे, हिंसा में उतरोगे।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org