मन अनजाने से भी डरता है और जाने हुए से भी

मन, हर उस चीज़ से डरेगा जो सीमित है। क्योंकि जो कुछ भी सीमित है उसे खत्म हो जाना है। और मन बिना छवि बनाये जी नहीं सकता। तो मन कहने को तो, नाम मात्र को तो कह देता है कि ‘अननोन’ (अज्ञात)। ‘अननोन’ का विशुद्ध अर्थ तो यह हुआ ना कि उसके बारे में तुम कुछ नहीं जानते। अगर कुछ नहीं जानते तो ये भी कैसे जानते हो कि उसके बारे में नहीं जानते। मन, कहने को तो कह देता है ‘अननोन’, पर अननोन के बारे में भी वो नॉलेज रखता है। क्या नॉलेज…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org