मजबूरी झूठ है

कोई ये न कहे कि मैं क्या करूँ? उसने मुझसे इतनी बुरी बात बोली कि मुझे गुस्सा आ ही गया। मुझे गाली मिली, मुझे गुस्सा आया, “मैं मजबूर था।”

नहीं!

मजबूर ‘यंत्र’ होता है, पूर्व निर्धारित कृत्य मशीन के होते हैं। बटन दबा, पंखा चलने लग गया ये बात ठीक है। पर इंसान कहे कि मेरा बटन दबा और मैं बकने लग गया तो वो झूठ बोल रहा है। हम जो करते हैं वो हमारा चुनाव होता है इसलिए मजबूरी बहुत झूठा शब्द है।

कोई मजबूर नहीं होता, हम सब चुनते हैं। हाँ! कुछ लोग गलत चुनते हैं और अपनी गलती छुपाने के लिए मजबूरी शब्द का सहारा लेते हैं। तुम क्यों नहीं मानते कि तुम जानबूझकर गलत चुनाव कर रहे हो? तुम क्यों नहीं मानते कि तुम्हारी आदत बिगड़ गई है? तुम क्यों नहीं मानते कि तुम्हें दुःख में रस आने लग गया है? इन सब कारणों से तुम स्वयं ही बार-बार गलत चुनाव करते हो और चुनाव की ज़िम्मेदारी न उठानी पड़े इसलिए कह देते हो कि मैंने तो चुना ही नहीं, मैं तो मजबूर था।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org