भारत में इतने अध्यात्म के बावजूद इतनी दुर्दशा क्यों?

दो-तीन बातें हैं: पहली बात तो अध्यात्म संख्या का खेल नहीं है कि सौ या पांच सौ गुरु हो गए तो ज्यादा संतोषजनक स्थिति हो जाएगी। यहाँ पर “इनपुट इज प्रपोर्शनल टू आउटपुट (इनपुट आउटपुट के लिए आनुपातिक है)” नहीं चलता। फैक्ट्रियों में ऐसा होता है कि पाँच मशीनें और लगा दीं तो आउटपुट बढ़ जाता है। अध्यात्म में ऐसा नहीं होता कि पाँच गुरु और लगा दिए तो आनंद बढ़ जाएगा या मुक्तजनों की तादाद और बढ़ जाएगी। ऐसा नहीं…

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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