भारतीय युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति अज्ञान और अपमान क्यों?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हम भारतवासी अपनी संस्कृति और विरासत को लेकर गौरव क्यों नहीं अनुभव करते? खासकर युवा पीढ़ी में तो गौरव छोड़िए बल्कि अपनी संस्कृति और अतीत को लेकर थोड़े अपमान का भाव है।

आचार्य प्रशांत: आप पूछ रहे हैं भारतवासी अपनी संस्कृति को और अपनी विरासत को लेकर गौरव क्यों नहीं अनुभव करते? ये संस्कृति और विरासत हैं क्या? क्या मिला है तुमको अतीत से धरोहर के रूप में? क्या है तुम्हारी संस्कृति?

इन शब्दों के अर्थ क्या हैं? कितनी गहराई से जानते हो इन्हें और अगर जानते ही नहीं तो इन पर गौरव कैसे अनुभव कर लोगे? गौरव किसी ऐसी ही चीज़ पर हो सकता है न तुम्हें जिसकी कोई कीमत हो और जिस चीज़ को तुम जानते नहीं, उसकी कीमत कैसे जानते हो? क्या तुम्हारी विरासत है? क्या अतीत? क्या धरोहर है? इसका तुमको, आम हिंदुस्तानी को, आज की युवा पीढ़ी को ज्ञान कितना है? और जिस चीज़ के बारे में जानोगे नहीं। ये तो छोड़ों कि उसको लेकर तुम्हे गौरव होगा तुम्हें उसको लेकर अपनापन भी नहीं होगा।

मैं अगर पुछूँ एक आम भारतीय से कि साहब! अपनी संस्कृति के बारे में कुछ बताइए। क्या है भारतीय संस्कृति? या कोई विदेशी आ जाए मान लो और तुमसे पूछने लगे कि आप भारतीय संस्कृति-सभ्यता और इनसे बहुत निकट की बात होती है धर्म, संस्कृति-सभ्यता-धर्म इनके बारे में कुछ बताइए तो आप क्या बता पाएँगे? एक आम भारतीय बता क्या पाएगा? वो वही बता पाएगा जो हमने आजतक बताया है पिछले तीस-चालीस सालों में।

दुनिया में भारतीय संस्कृति का अर्थ होता है- कास्ट, काऊ एन करी कि भारतीय संस्कृति क्या है? वो जिसमें जातिप्रथा चलती है, जिसमें खाने में सब्जी-तरकारी बनती है और जिसमें गाय की पूजा की जाती है। अच्छा! और बताओ और क्या है भारतीय संस्कृति? क्या है उसके प्रतीक? क्या है उसका आधार? तो तुम कह दोगे ‘होली-दिवाली’, तुम कह दोगे ‘नमस्ते’ ये हमारी संस्कृति का प्रतीक है। ये सब बातें कितनी धुंधली-सी हैं न? इनमें कोई स्पष्टता है? इनका कोई ठोस केंद्र है? तुम कैसे गौरव करोगे किसी ऐसी चीज़ पर जिसके बारे में तुम्हारे ही मन में धुंधलका छाया हुआ है। बहुत सारे लोगों को तो अपने नाम तक का अर्थ नहीं पता होता, उन्हें अपनी संस्कृति का क्या पता होगा? और अभी पिछले एक-दो दशकों से तो ऐसा भी हो रहा है कि माँ-बाप बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं जो बिल्कुल अनर्थक होते हैं। जिनके अर्थ में ही नाश छुपा होता है। कुछ जानते ही नहीं, जब नहीं जानते तो क्या गौरव करोगे?और तुमसे पूछे कोई हाँ जी! बताइए अपनी संस्कृति के बारे में तो तुम क्या बता पाते हो? तुम कहते हो “हमारी संस्कृति रामायण और महाभारत की संस्कृति है।” यही बोलते हो न?

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org