ब्रह्मलीन होने का अर्थ क्या है?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आज के पाठ से अध्ययन का आनंद हुआ। कैसे हुआ, किसे हुआ, यह नहीं कह सकते, बस आनंद ही था। जब हम केवल ब्रह्म-अनुभूति में रम जाते हैं, मन अमन होता है, तब भी संसार का व्यवहार तो द्वैत में ही होगा, मान्यताएँ भी होंगी, वृत्तियाँ भी होंगी। तो मुक्त कौन होगा जब बंधन ही नहीं है?

इस संसार का भोग करते हुए, ब्रह्म में निष्ठा रखते हुए जीना सहज है व आनंदपूर्ण है। सारे ही सवाल इस एक बात पर ख़त्म हो जाते हैं कि सब ब्रह्म है। जानने वाला, क्रिया, कर्ता, भोक्ता, सब ब्रह्म ही है। कहीं भी जो कुछ हो रहा है, सब कुछ ब्रह्म ही है। अहोभाव! धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद!

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org