बोध ही जीवन है

प्रश्न: सर, जैसा कि नाम कहता है ‘अद्वैत लाइफ-एजुकेशन’, तो मेरा सवाल यह है कि जीवन(लाइफ) क्या है| मैं ये भी पूछना चाहती हूँ की हमारी ज़िन्दगी में ऐसा क्या है जो हमारा अपना है| सब कुछ तो हमें समाज से मिलता है| समाज ने ही हमें ये बताया कि हमें ये करना चाहिए, वो करना चाहिए| तो इसमें हमारा क्या है?

वक्ता: सबसे पहले तो ये जान लेना कि सब कुछ बाहर से आता है, ये बड़ी बात है| सब कुछ पाया ही हुआ है| शरीर की जो पहली दो कोशिकाएं हैं, वो बाहर से आती हैं और उसके बाद वो सब कुछ जिसे तुम अपना बोलते हो, वो बाहर ही बाहर से आता रहता है| शरीर बना है खाने से, हवा से, पानी से, और ये सब बाहरी है| शुरुआत से लेकर अंत तक शरीर बाहर ही बाहर का है| उसका जो ढांचा है पूरा, उसका पदार्थ ही नहीं, उसका जो ढांचा है पूरा, वो बाहरी है| तुमने नहीं तय किया था कि हाथ में पांच ऊँगलियाँ ही हों, तुमने नहीं तय किया था कि दो आँखें ही हों| ये बात बाहरी ही है |

मन में जो विचार उठते हैं, वो भी सब बाहरी ही हैं| बाहर से कोई बात है जो अंदर आकर बैठती है, वही बात चित्त बनती जाती है और चित्त में फिर विचार उठते हैं| शरीर बाहरी, मन बाहरी और ये जो दुनिया दिखाई दे रही है आँखों से, ये तो बाहरी है ही| तो अच्छा सवाल है शुरू करने के लिए कि मेरा क्या है ?

क्या बाहरी खुद जान सकता है कि ‘मैं बाहरी हूँ’? कौन ये समझ रहा है कि ये सब कुछ बाहरी है? कौन समझ रहा है इस बात को ? जो समझने वाला है, क्या वो खुद भी बाहरी हो सकता है? ठीक है आँखें बाहर को देख रहीं हैं और आँखों को जो कुछ दिखाई देगा वो बाहर का ही होगा| पर आँखों ने जो कुछ देखा, उसको समझने वाला, उसको जान जाने वाला, उसका बोध कर लेने वाला वो बाहरी नहीं हो सकता| वो बाहरी नहीं हो सकता|

(हँसते हुए) पर वो तुम्हारा भी नहीं हो सकता| क्योंकि तुम जिस सब को अपना बोलते हो, वो क्या है ?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): बाहरी|

वक्ता: एक-एक चीज़ जिसको तुमने अपना बोला है जीवन में, वो बाहरी ही है| तो इस गणित को समझना, वो सब कुछ जिसको तुम अपना बोलते हो- शरीर, नाम- जो कुछ भी अर्जित किया जा सकता है, वो तो बाहरी ही है| जो वास्तव में तुम्हारा होगा, वो तुमको लगेगा ही नहीं कि तुम्हारा है| उसे तुम अपना कह ही नहीं सकते क्योंकि तुमने तो अपने आप को बाहरी के साथ ही जोड़ रखा है|

ज़िन्दगी में जो हो रहा होगा सदा बाहरी ही हो रहा होगा| हाँ, अगर उसको होश-पूर्वक जान लिया, समझ लिया, तो तुम हो| तुम्हारा काम है, तुम्हारा स्वाभाव है, समझना| जो कुछ घट रहा है उसको होश-पूर्वक जान जाना, देख लेना| पर जो कुछ घट रहा है उसको तुम होश-पूर्वक जान तब पाओगे, देख तब पाओगे, जब तुम उसके साथ जुड़ ही न जाओ जो घट रहा है |

पेट में भूख लग रही है| अब अगर मैं पेट ही हूँ, मैं शरीर ही हूँ तो फिर भूख मुझे ही लग रही है| लेकिन एक दूसरा भी आदमी हो सकता है जो कहे कि पेट को भूख लग रही है…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org