बुद्धि के स्तर पर मनुष्य पशुओं के ही समान है
प्रश्नकर्ता: क्या बुद्धि और प्रकृति एक ही तल पर हैं?

आचार्य प्रशांत: प्रकृति का छोटा सा अवयव है बुद्धि।

प्र: और अभी मनुष्यों में भी प्रकृति जो है बुद्धि के माध्यम से ही अभिव्यक्ति पा रही है।

आचार्य: प्राकृतिक ही है बुद्धि। देखो न, इतने जीवो को देखो, सबकी बुद्धि उनकी देह माया के अनुरूप होती है। कुत्ते की एक तरह की बुद्धि है, तोते की दूसरे तरह की बुद्धि है। क्यों? क्योंकि तोता शरीर से तोता होता है और कुत्ता शरीर से कुत्ता है। तो प्रकृति के अनुसार ही बुद्धि चलती है। बुद्धि कोई प्रकृति से बाहर की बात नहीं, छोटी सी चीज़ है प्रकृति की सीमाओं के अंदर।

प्र: बुद्धि को या इंटेलेक्ट को इस तरीके से देखा जाता है जो जानवरों के पास नहीं है।

आचार्य: यह मनुष्य की दुर्बुद्धि है कि वह सोचता है कि सिर्फ़ उसी के पास बुद्धि है। ऋषि ने और क्या बोला यहाँ राजा को? कि हाँ, समझदार तो तुम हो लेकिन तुम्हारे जितनी समझदारी तो यह सब मेरे जो गाय, भैंस और हिरण और खरगोश हैं, इनमें भी है। तो ये जो मोह ग्रस्त लोग होते हैं, उस राजा जैसे, उस वणिक जैसे, यह उनका कहना होता है कि सिर्फ़ इंसानों के पास बुद्धि है, जानवरों के पास नहीं है। ऐसा कुछ नहीं, सब के पास अपनी-अपनी तरह की प्राकृतिक बुद्धि है और सब अपनी बुद्धि के अनुरूप आचरण कर रहे हैं। उसमें कोई विशेष बात है ही नहीं।

प्र: जब इवोल्यूशन (विकास) के नज़रिए से देखा जाता है तो ऐसा देखा जाता है कि जानवर जैसे पहले था वह आज भी वैसा ही है, लेकिन इंसानों ने बहुत तरक्की कर ली है।

आचार्य: यह बात मनुष्य की प्रकृति के अंदर की है। पशुओं की प्रकृति है कि वे जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे। मनुष्य की प्रकृति ही है कि वे जैसे हैं, उसमें वे प्रगति करेंगे। पर वह सारी जो प्रगति है, वह प्रकृति के अंदर ही है, प्रकृति के बाहर नहीं ले जा रहे उन्हें। तुमको फिर ऐसा कहना चाहिए कि पशु पुरातन जंगल में रहता है और मनुष्य सीमेंट-कांक्रीट के जंगल में रहता है। पर तुम्हारे शहर भी उतने ही प्राकृतिक है जितने कि पशुओं के जंगल। भाई, निर्माण कोई मनुष्य मात्र ही थोड़ी करता है। बया पक्षी का घोंसला देखा है? वहाँ बोधस्थल के बाहर खंभे पर गिलहरी ने अपना एक घोंसला बना लिया, वह भी तो निर्माण करती है। सब निर्माण करते हैं, कर रहे हैं।

तो उनका निर्माण भी वैसे ही प्रगति है जैसे तुम्हारे ये सब निर्माण हैं। जो कुछ भी हो रहा है, वह है सब प्रकृति के आधीन ही। दिक्कत तब हो जाती है, जब हम सोचते हैं कि हम शहर बना करके प्रकृति से बाहर आ गए। चूँकि तुम सोचते हो कि शहर बना करके तुम प्रकृति से बाहर आ गए तो जब कभी तुम जंगल की सैर को जाते हो तो कहते हो अब मैं प्रकृति के पास जा रहा हूँ। ऐसे ही कहते हैं न लोग? अब मैं सप्ताहांत बिताने के लिए प्रकृति के पास जा रहा हूँ।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org