बीमारी को बीमारी न मानना ही बीमारी है

एक दुर्घटना हो गयी है। दुर्घटना ये है कि हमने एक झूठ को सच मान लिया है। अगर आप को ये पता ही हो कि आप तकलीफ में हैं, तो आपके पास पूरा बोध है, पूरी शक्ति है, उस तकलीफ से मुक्त हो जाने की। क्योंकि तकलीफ में कोई जीना नहीं चाहता। लेकिन आदमी के साथ एक विचित्र स्थिति है। मैं उसी को दुर्घटना का नाम दे रहा हूँ। वो स्थिति ये है कि हम तकलीफ में होते हैं, पर उसे तकलीफ का नाम नहीं देते, हम उसे कोई खूबसूरत नाम दे देते हैं। तो तकलीफ कायम रह जाती है।

जो कैंसर अपने होने का एहसास करा देता है, उसका अकसर इलाज हो जाता है। इसलिए कुछ तरह के कैंसर बहुत घातक होते हुए भी मौत नहीं ला पाते। क्यों? क्योंकि वो दिख जाते हैं।

और कुछ कैंसर ऐसे होते हैं जो उतने घातक नहीं होते पर जिनमें मृत्यु दर बहुत ज़्यादा है, क्योंकि दिखते ही सिर्फ आखिरी हालत में हैं।

हम बीमारी को बीमारी का नाम ही नहीं दे पाते। हम सब समर्थ हैं। ताकत हम सब में है, बुरा न होने की, कष्ट में न जीने की, विद्रोह कर देने की। पर विद्रोह तो आप तब करो ना, बंधन से तो आप तब छूटो ना, जब पहले आप बंधन को बंधन मानो।

हमारी शिक्षा कुछ ऐसी हो गयी है, हम में मूल्य कुछ ऐसे भर दिए गए हैं कि हम बंधन को बंधन नहीं मानते, हम उसे कोई सुन्दर नाम दे देते हैं; हमें सिखा ये दिया गया है। हमारा दम घुट रहा होगा, हम मानेंगे ही नहीं कि दम घुट रहा है। हम कहेंगे, “न न न, ये तो ऐसे ही दिन की सामान्य थकान है।” हमें प्रेम न मिल रहा होगा, हम मानेंगे ही नहीं कि हम प्रेम के प्यासे हैं। हम कहेंगे, “न, जीवन ऐसा ही होता है। इसी को तो परिवार कहते हैं। परिवार का अर्थ है वो जगह जहाँ प्रेम न होता हो। ये तो हमें बता ही दिया गया था। तो यदि इस घर में मुझे प्रेम नहीं मिलता, तो ये कोई विद्रोह की बात ही नहीं है। ये तो सामान्य है।”

सामान्य की जो हमारी परिभाषा है, वो बड़ी गड़बड़ हो गयी है। इसलिए हम विद्रोह नहीं कर पाते। विद्रोह उठता भी है, तो हम उसको दबा देते हैं। हम कहते हैं, हर घर में यही तो हो रहा है। और देखो ना, टी वी को देखो, स्कूल को देखो, कॉलेज को देखो, परिवार को देखो, माँ बाप को देखो, उन सबने यही तो बताया है कि ऐसा ही होता है। और ऐसा ही होता है तो मैं होता कौन हूँ क्रांति करने वाला। मैं होता कौन हूँ, उस जगह से उठ जाने वाला, जो जगह चुभ रही है।

हमने स्वार्थ को गंदा शब्द बना दिया है। हमें जब किसी को गाली देनी होती है तो हम कहते हैं, “तू स्वार्थी है।” नतीजा क्या निकला है? नतीजा ये है कि हमें अपने ही हित का अब कोई ख़याल नहीं है। वास्तविक स्वार्थ हम जानते ही नहीं। वास्तविक स्वार्थ परमार्थ होता है। वो ईश्वरीय बात है। वो परमात्मा की दी हुई चीज़ है।

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org