बिना अध्यात्म के कैसी होगी राजनीति!

आप जिसे राजनीति कहते हैं या जिन्हें राजनेता कहते हैं उनका असर आपके जीवन पर कई तरीकों से पड़ता है, सिर्फ इसी तरीके से नहीं कि वह सड़क, पानी बिजली के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, अन्यथा भी कई तरीकों से वह आपके जीवन को प्रभावित करते हैं।

तो जब आदमी अपनी जागृति की ओर बढ़ने लगता है तो वह अपने माहौल की तरफ भी बड़ा सजग होने लगता है। वह कहता है माहौल में ऐसा कुछ क्यों रखूँ जो मुझे गंदा करता हो और अगर माहौल में राजनेता भी शामिल है तो फिर वह राजनेताओं में भी जो श्रेष्ठतम होगा उसको ही चुनेगा चाहेगा।

इसी तरीके से जिसको आप आदर्श बनाते हैं वह आपको बहुत दिशाओं से प्रभावित कर ले जाता है। और जब आप इस बात के प्रति चिंतित होने लगते हैं कि समाज में जागृति आनी चाहिए तो आप इस बता को ले कर भी सजग हो जाते हैं कि समाज के जो नेता हैं वह ठीक लोग ही होने चाहिए।

अध्यात्म का जीवन के हर पक्ष से सम्बन्ध है, ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है या असंवेदनशील हो जाता है। या अनदेखा करने लग जाता है, बल्कि हकीक़त यह है कि राजनीति को अध्यात्मिक लोगों की बहुत ज़रूरत है क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं जहाँ से वह आपके जीवन को बहुत तरीकों से प्रभावित करते हैं।

राजनेता यदि आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा।

जहाँ आध्यत्म की कमी होगी वहाँ डर होगा इसीलिए पद जितना ऊँचा हो उतना ही ज़्यादा आवश्यक हो जाता है कि उस पद पर जो आसीम है, वो आध्यात्मिक हो।

छोटी-मोटी ज़िम्मेदारी वाला आदमी यदि डरपोक भी हो तो बहुत नुकसान नहीं हो जाएगा पर जब एक ऊँचा न्यायाधीश जिसके कंधे पर ज़िम्मेदारी है कि न्याय ही हो वो डरने लगे जाए तो फिर न्याय की, धर्म की बड़ी हानि हो जाएगी और निर्भयता सिर्फ एक जगह से आती है आत्मा से और अध्यात्म आत्मा का अनुसंधान है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org