बिखरे मन के लिए संसार में टुकड़े ही टुकड़े हैं

स्वाति बूंद केतली में आए, पारस पाये कपूर कहाए।

दर्पण फूटा कोटि पचासा, दर्शन एक सब में बासा।।

~ संत दादू दयाल

आचार्य प्रशांत: आप एक स्थान पर खड़े हैं और आपके चारों तरफ असंख्य शीशे हैं — ऊपर, नीचे, दसों दिशाओं में शीशे हैं; हर रंग, हर आकार और हर प्रकार का शीशा है। मुड़े हुए शीशे, छोटे शीशे, बड़े शीशे और जितने प्रकार हो सकते हैं। आपको चारों…

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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