बातूनी मन को चुप कैसे कराएँ?

बातूनी मन को चुप कैसे कराएँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मौन साधना क्या है? इसमें क्या अड़चनें हैं? और मौन साधक का जीवन कैसा होना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: मौन साधना कोई विशिष्ट साधना नहीं होती, साधना ही मौन साधना है। मन बातूनी है, बक-बक, वाचाल। मन की ही बातचीत जीवन में निरर्थक कर्मों के रूप में परिलक्षित होती है। जो कुछ भी तुम कर रहे होते हो, पहले वो प्रकट होता है मन में विचार के रूप में, या वृत्ति के रूप में, एक लहर, एक संवेग के रूप में। वही है मन की बक-बक।

मौन साधना का अर्थ है ये समझना कि बातचीत करने के लिए दो चाहिए। दूसरा न मिले तो पहला बहुत देर तक नहीं बोल पाएगा। दीवारों से कितनी देर तक बात करोगे भाई? मन बक-बक करना चाहता है, तुम उसकी बक-बक में सहभागी न बनो, तुम उत्तर न दो तो मन की बक-बक बहुत दूर तक नहीं जाएगी। मन ने कुछ बोला और तुमनें कहा, ‘बात ठीक है’, तो भी तुम मन के सहयोगी हो गये। और मन ने कुछ बोला और तुमनें कहा, ‘बात ठीक नहीं है’, तो भी तुम बातचीत में प्रतिभागी हो गये।

मौन साधना का अर्थ होता है — मन को बोलने दो, तुम अपना काम करो, तुम्हारे पास बहुत काम हैं।

मन का काम है स्वयं बोलते रहना। मन इन्द्रियों का ग़ुलाम है, प्रकृति का ग़ुलाम है, शरीर की वृत्तियों का ग़ुलाम है। तुम्हारा काम है किसी और को बोलने देना, जान लगा देना उसको ढूँढने में जिसका बोल तुम्हें खींचें ले रहा है, जिसकी आवाज़ से तुम्हें प्यार है।

तुम्हारा काम अति कठिन है, तुम गपशप में कैसे तल्लीन हो गये? कि जैसे तुम्हें प्यार हो गया हो और एक तुम्हारा दोस्त है जिसको प्यार का ‘प’ नहीं पता। जिससे तुम्हें प्यार है वो कहीं गुम है, उसकी छवि भर दिखाई देती है, हल्की-हल्की उसकी आवाज़ भर आती है। अब तुम्हारा यार चाय-पकोड़े लेकर के बैठा हुआ है, और दुनिया भर की बकवास, वाचा-रंभण। वो करे तो करे, तुम कैसे करने लग गये? उसकी ज़िन्दगी रूखी है, सूनी है। उसके लिए चाय-पकोड़े से ऊपर कुछ है ही नहीं। तुम्हारे पास प्रेम है, तुम चाय-पकोड़े के साथ क्या कर रहे हो?

और मन की सारी बातचीत चाय-पकोड़े के तल से ऊपर की होती है क्या? कहीं की चाय, कहीं की कॉफ़ी, किसी का पकोड़ा, किसी का हथोड़ा, यही तो चलता है मन में, और भी कुछ चलता है क्या? कहीं पकड़ा, कहीं जोड़ा, यही चलता है न? ये काम उसको करने दो जिसके पास इस काम से अलग, इस काम से बेहतर कुछ है ही नहीं।

तुम्हारे पास प्रेम है, तुम अपना काम करो। वो जो बक-बक कर रहा है, कितनी देर तक करेगा, जब तुम निकल गये? तुम चुप, तो वो भी चुप। वो बोल ही इतना इसलिए पाता है, क्योंकि तुम अपना काम-धंधा छोड़कर उसकी बातचीत में शामिल हो जाते हो। नहीं तो वो बोलेगा थोड़ा-बहुत, उसके बाद उसे चुप होना पड़ेगा।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org