प्रेम व्यक्त करते डरता क्यों हूँ?

हम प्रेम नहीं जानते, प्रेम के नाम पर आकर्षण जानते हैं और आकर्षण बिल्कुल मुर्दा चीज़ है। प्रेम से ज़्यादा ज़िंदा कुछ नहीं और आकर्षण से ज़्यादा मुर्दा कुछ नहीं। आकर्षण तो वैसा ही है जैसा कि दो रसायन आपस में मिल जाएँ, उनमें भी आकर्षण होता है आपस में, खूब आकर्षण होता है। लोहे और चुम्बक में आकर्षण होता है, वो प्रेम तो नहीं है। एक ख़ास उम्र में आते हो, शरीर में कुछ रासायनिक क्रियाएँ शुरू हो जाती हैं, हॉर्मोन्स एक्टिव हो जाते हैं, इस कारण तुम्हारा शरीर किसी दूसरे शरीर की तरफ आकर्षित होना शुरू हो जाता है। तो ये प्रेम तो नहीं है। ये तो इधर के रसायन हैं जो उधर के रसायन से मिल जाना चाहते हैं और एक केमिकल रिएक्शन हो जाए, बस यही प्रकृति की इच्छा है। इसमें प्रेम कहाँ है? पर तुम्हारी इसमें कोई ख़ास गलती नहीं क्योंकि तुमने बचपन से और कुछ देखा ही नहीं। एक जवान लड़का, एक जवान लड़की के पास जाता है और पीछे से गाना बजना शुरू हो जाता है, दिल-विल प्यार-व्यार और तुमने समझ लिया कि यही प्यार है। ये प्यार नहीं है, फूहड़पन है। गुलाल उड़ेगा और ढपली बजेगी और लड़का और लड़की दोनों आकर्षक होंगे। तुम्हें बड़ा आनन्द आता है, तुम्हें लगता है कि शायद इसी को प्यार कहते हैं ।

प्रेम किसी व्यक्ति में निहित नहीं होता, प्रेम कोई तलाश नहीं है कि कोई मिल जाए। दूसरे की तलाश का बंद हो जाना ही प्रेम है। प्रेम का अर्थ है कि मैं इतना भर गया हूँ आनन्द से कि अब सिर्फ बाँट सकता हूँ। कोई मेरे जीवन में आकर मेरे अधूरापन को पूरा कर दे, तो इस भाव का नाम प्रेम नहीं है। हमारा भाव यही है कि तेरे बिना मैं अधूरा हूँ। इस बात का नाम प्रेम नहीं है। प्रेम वो नहीं है कि जब तुम किसी की कमी महसूस करते हो। प्रेम का अर्थ है कि मुझे तो किसी की ज़रूरत ही नहीं है। और तुम ऐसे भरे हुए हो कि तुम्हारे जीवन में जो भी कोई आता है, तुम उसी से प्रेमपूर्ण हो जाते हो। तुम्हें किताब से प्रेम है, तुम्हें जीवन से प्रेम है, तुम्हें प्रतिपल प्रेम है। तुम प्रेमपूर्ण हो गए हो और वो सीमित नहीं है किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति। प्रेम ऐसा नहीं होता कि तू तो मेरी प्रेमिका है और बाकि सारी दुनिया से मैं लड़ रहा हूँ तलवार ले कर। जब तुम प्रेम जानोगे तो प्रेम हो जाओगे। फिर पूरी दुनिया के प्रति प्रेमपूर्ण रहोगे। डर कैसा?

प्रेम का तो अर्थ है जीवन में पूरी क्रान्ति आ गयी, सब बदल गया कुछ पाने को नहीं है अब। इतना पा लिया है कि सिर्फ बाँट सकता हूँ। प्रेम याचना करने नहीं जाता कि मेरी प्रेमिका बन जाओ, ये लो फूल, और उसने मना कर दिया तो घूम रहे हैं बन कर देवदास। ये प्रेम है? और दिल धड़का जा रहा है, सहमा जा रहा है कि हाँ करेगी, या ना करेगी। और यही हाल दूसरी तरफ भी है कि पड़ोसन को तो तीन-चार प्रपोज़ल आ चुके हैं, मुझे एक भी नहीं। ये प्रेम है? फूहड़ता है। ये तुमने दो कौड़ी की चीज़ को बहुत अच्छा सा नाम दे दिया है, प्रेम। प्रेम तो तुम्हारी आतंरिक मौज है। जो तुम्हारे संपर्क में आएगा उसी तक पहुँचेगी। बस में जा रहे हो, बगल में कोई बैठा है, उसके साथ सम्बन्ध प्रेमपूर्ण बिताओगे। सड़क पर जानवर भी है तो उसको पत्थर नहीं मारने लगोगे, इतना ज़रूर करोगे कि भूखा है तो रोटी दे दोगे।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org