प्रेमिका छोड़ कर चली गई?

प्रश्न: आचार्य जी, मेरी प्रेमिका मुझे कल ही छोड़कर चली गई। दर्द में हूँ। क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: दूसरी खोज लो।

जब प्रश्न के केंद्र पर प्रेमिका बैठी है, तो तुम्हारी उत्सुकता प्रेमिका से आगे की है ही नहीं न। ये खेल चलता रहेगा — कभी एक से जुड़ोगे, कभी दूसरे से। कभी एक छोड़ेगा, कभी दूसरे को पकड़ोगे। ये खेल चलता रहेगा। यही करते रहना है?

तुम्हारे प्रश्न से लग रहा है कि बीस-तीस साल, बहुत होगा तो पैंतीस साल, इसी अवस्था के हो। ये जो समय है तुम्हारे पास, जिसमें बल है, ऊर्जा है, इसको इसी खेल में लगाना है, जैसे बहुत लोग लगाते हैं? और जब युवावस्था होती है, तो लगता है कि अभी समय बहुत है। पर वास्तव में समय कितना है? तीस साल -चालीस साल। बहुत तो नहीं है न।

पता भी नहीं चलेगा कब इन्हीं शारीरिक, रासायनिक चक्करों में जीवन निकल ही गया। कल वो तुम्हें न छोड़कर गई होती, तो कोई बड़ी बात नहीं है कि आज तुम ये कह रहे होते कि — “आचार्य जी, मेरी प्रेमिका मुझे छोड़कर नहीं जा रही। बहुत परेशान करती है। क्या करूँ?”

परेशानियों में अगर उलझना ही है, तो ज़रा ऊँची परेशानियाँ आमंत्रित करो।

बड़ी चुनौतियाँ उठाओ न।

ये लड़का-लड़की के खेल तो पशु भी खेल रहे हैं।

इंसान का जन्म यही करने के लिए थोड़े ही मिला है।

आगे बढ़ो!

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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