प्रसन्नता और आनंद में क्या अंतर है? स्वभाव क्या?

जाके जौन स्वाभाव, छूटे नहीं जीव सो,

नीम ना मीठी होय, सींचै गुड़ घीव सो।।

~ संत कबीर

प्रश्नकर्ता: जब स्वभाव बदल ही नहीं सकता तो गुरु किसी मनुष्य को कैसे जगाने में सहायता कर सकता है?

आचार्य प्रशांत: यहाँ पर कबीर जिस स्वभाव की बात कर रहे हैं, वो प्राकृतिक स्वभाव है। प्रकृति है। वो बदल सकता है। वो बदल न सकता होता, तो कबीर भजन लिखते ही नहीं। जिस भजन से आप ये पंक्तियाँ उद्धृत कर रहे हैं, उसकी पहली पंक्ति है — “गुरु शरण जाय के, तामस त्यागिये”, यानी कि तामस को त्यागना सम्भव है। आगे जब वो कह रहे हैं, “जाके जौन स्वाभाव, छूटे नहीं जीव सो”, तो इसको इसी अर्थ में पढ़िए कि संभव है, लेकिन मुश्किल बहुत है। मुश्किल बहुत है। इसीलिए तो बड़ी साधना की ज़रुरत होती है। इसीलिए तो गुरु की शरण जाना पड़ता है।

अभिषेक पूछ रहे हैं कि प्रसन्नता और आनंद में क्या अंतर है, और अगर आनंद एक पूर्ण रिक्तता है तो वहाँ पहुँचा कैसे जाता है?

प्रसन्नता इस पर निर्भर करती है कि आपने अपने आप को, किस बात में, किस चीज़ से प्रसन्न रहना सिखा दिया है। प्रसन्नता स्थिति सापेक्ष है, संयोग सापेक्ष है। और प्रसन्नता सदा निर्भर करती है, किसी घटना पर, किसी वस्तु पर, किसी व्यक्ति पर, किसी विचार पर। ये सब न हो तो आप प्रसन्न नहीं हो सकते। यही कारण है कि एक घटना जो एक व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का कारण होती है, दूसरे व्यक्ति के लिए अप्रसन्नता का, दुःख का। एक ही घटना एक व्यक्ति के लिए अभी प्रसन्नता का कारण है, थोड़ी देर में विषाद का। वो आपकी स्थिति पर निर्भर करती है, आपने अपने आप को क्या बना लिया है।

मक्खी को गुड़ में प्रसन्नता है, हत्यारे को हत्या में प्रसन्नता है, शराबी को शराब में प्रसन्नता है, कामी को काम में प्रसन्नता है, लोभी को दाम में प्रसन्नता है। और आनंद है, प्रसन्नता के तनाव से मुक्त हो जाना।

प्रसन्नता हमेशा एक ख़ाहिश है, एक मांग है, “मुझे प्रसन्न होना है।” आनंद है, इस मांग से ही मुक्त हो जाना कि मुझे प्रसन्न होना है। आनंद है, बिलकुल निरभार हो जाना। कुछ चाहिए नहीं, स्वयं को दिलासा देने के लिए, कुछ चाहिए नहीं, स्वयं को पूरा करने के लिए। कुछ चाहिए नहीं, अपने से जोड़ने के लिए। जो ही स्थिति है, उसी में हम साबुत हैं, सलामत हैं, पूर्ण हैं — ये आनंद है।

प्रसन्नता चीज़ मांगती है, घटना मांगती है, आनंद नहीं मांगता, बेशर्त होता है। और प्रसन्नता धोखा देती है, लगातार नहीं टिक सकती। और आनंद चूंकि बेशर्त होता है, इसीलिए लगातार हो सकता है। प्रसन्नता की शुरुआत भी दुःख से है, और अंत भी दुःख में। तुम अगर दुःखी नहीं हो, तो

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org