पूरे जीवन में प्रतिपल

और क्या हो रहा है?

सुलग ही तो रहे हो!

धुआँ-धुआँ हो तुम,

इस खातिर नहीं जन्मे थे,

ये आवश्यक नहीं था!

तुम्हें जन्म इसलिए नहीं मिला था कि

तुम इतनी सड़ी-गली तरह से

इसको बिता दो।

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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