पुरानी परम्पराएँ: मान लें या त्याग दें?

पुरानी परम्पराएँ: मान लें या त्याग दें?

प्रश्नकर्ता: जय-हिन्द आचार्य जी। मेरा प्रश्न यह है कि हम जीवन में हाँ और ना के बीच उलझे रहते हैं। हमारे बीच एक जंग छिड़ी रहती है कि हाँ बोलें कि ना बोलें। मैं एक प्रसंग आपको बताना चाहूँगा। हमारे यहाँ पर हवन-पूजन की परंपरा चलती है, तो हम कलावा बाँधते हैं।

घर वालों की सुनते हैं कि आप बाँध लीजिए। लेकिन हमारा मन नहीं करता, हम उसे मानते नहीं है, तो कभी-कभी हम उसे ना भी बोल देते हैं कि नहीं हमें नहीं…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org