पशुओं के प्रति हिंसा

प्रकृति का सुंदर संतुलन है। किसी भी प्रजाति की संख्या एक सीमा से प्रकृति स्वयं ही नहींं बढ़ने देती।

आदमी शेर तो नहींं खाता न? तो गली-गली शेर घूम रहे हैं? पेड़ों पे शेर लटके हुए हैं? घरों के अंदर शेर दुबके हुए हैं? जहाँ जाओ वहाँ शेर नज़र आ रहे हैं क्या?

तो ये अपने उपद्रव को छुपाने वाले मूर्खतापू्ण तर्क हैं कि “अगर मैं नहींं खाऊंगा तो उनकी तादाद बढ़ जाएगी” जानते हो न मुर्गे कैसे खाते हो तुम? मुर्गे कृत्रिम रूप से…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org