परिवार और ज़िम्मेदारियाँ आड़े आते हों तो

परिवार और ज़िम्मेदारियाँ आड़े आते हों तो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परिवार और कर्तव्यों के कारण मैं सत्य की तरफ़ एक मन से नहीं बढ़ पा रही। कृपया इस बात का झूठ देखने में मेरी मदद करिए।

आचार्य प्रशांत: ये लड़का (सामने बैठा श्रोता) एक सौ बीस किलो का है, यही उत्तर है मेरा। इस सूत्र से जो समझना है समझ जाओ।

अगर ये आश्रम आएगा तो क्या लेकर के आएगा? पूरे एक सौ बीस किलो। जिसके ऊपर जो बोझ लग गया वो बोझ लिये-लिये उसे आगे बढ़ना है न। मैं मान भी लूँ कि परिवार और कर्तव्य तुम्हारे ऊपर एक बोझ की तरह हैं, तो तुम्हें वो बोझ लिये-लिये ही तो आगे बढ़ना है।

आज इसको (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) बोला मैंने, मैंने कहा तू जिम (व्यायामशाला) जाया कर और खेला कर। अब ये जिम जा रहा है। काहे के लिए जाएगा जिम ? वज़न कम करने के लिए। वज़न कम करने के लिए भी जाएगा तो कितना वज़न लेकर जाएगा?

श्रोता: पूरे एक सौ बीस किलो।

आचार्य: या बीस-चालीस किलो (स्वयं का) माँस घर पर छोड़कर जाएगा? ‘लो दिव्या ये तुम तब तक फ्रीज़र में रखो। फिर लौटकर आऊँगा तो धारण कर लूँगा। भाई! उतना लेकर के ट्रेडमिल पर दौड़ना मुश्किल पड़ेगा।’

जैसे हो वैसे ही आगे बढ़ोगे न? जो जहाँ है उसे वैसे ही तो आगे बढ़ना है, यही तो खेल है, यही मज़ा है, यही चुनौती है। जिसके आँख नहीं है वो बिना आँख के आगे बढ़े, जिसके एक पाँव नहीं वो बिना पाँव के आगे बढ़े। जिसके दो पाँव नहीं, वो दोनों पाँव के बिना आगे बढ़े और जिसके ऊपर बहुत सारा वज़न हो वो उस सबके साथ आगे बढ़े। उसके अलावा कोई भी कल्पना करना या चाहत करना अव्यावहारिक है। तुम्हारी चाहत कैसे पूरी होगी?

अब जुड़ तो गई हो न? वो तो यथार्थ हो गया तुम्हारा, ठीक वैसे ही जैसे वज़न यथार्थ होता है। और वज़न तो फिर भी आदमी घटा ले, मातृत्व का रिश्ता तो घटाए नहीं घटता। अपने तन से निकला है, अपने तन से दूर हो गया है, लेकिन माँओं का तो ऐसा है कि ऐसा लगता है मेरे तन का ही हिस्सा है वो। तो अब ये पूछना कि ये मेरे रास्ते की बाधा है, इसके प्रति कर्तव्य है, ज़िम्मेदारी है इत्यादि-इत्यादि है, यह अव्यवहारिक सवाल है, ये बेकार की बात है।

जो है, जैसा है मामला, जो भी ज़िम्मेदारियाँ हैं, कंधे पर जो कुछ भी बैठा रखा है, सिर पर जो कुछ भी बैठा रखा है, छाती से जो कुछ भी लगा रखा है उसको लिये-लिये आगे बढ़ो। यही धर्म है। और अब इसी में तुम्हारी सृजनात्मकता को चुनौती है कि कैसे इन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ना है।

देखो तो दोनों ही विकल्प बंद हैं तुम्हारे लिए। न तो तुम यह कह सकती हो कि कर्तव्य बहुत हैं तो आगे नहीं बढ़ूँगी। आगे तो बढ़ना पड़ेगा, नहीं…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

More from आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant