परधर्म भयावह है || श्रीमद्भगवद्गीता पर

परधर्म भयावह है || श्रीमद्भगवद्गीता पर

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || ३, ३५ ||

दूसरों के कर्त्तव्य का भली-भाँति अनुसरण करने की अपेक्षा स्वधर्म को दोषपूर्ण ढंग से करना भी अधिक कल्याणकारी है। दूसरे के कर्तव्य का अनुसरण करने से भय उत्पन्न होता है और स्वधर्म में मरना भी श्रेयस्कर होता है।
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ३५

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org