नैतिकता, धार्मिकता का भ्रामक विकल्प

क्व स्वाच्छन्द्यं क्व संकोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः।

निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

~ अष्टावक्र महागीता (१८.९२)

(योगी निष्कपट, सरल और चरित्रवान होता है। उसके लिए स्वच्छंदता क्या, संकोच क्या और तत्त्व विचार भी क्या)

आचार्य प्रशांत: न पाप न पुण्य —

जब धर्म विषैला हो जाता है तो

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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