निष्कामता ही श्रेष्ठ जीवन है

निष्कामता ही श्रेष्ठ जीवन है

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।।१८।।

इस संसार के कर्मों के अनुष्ठान से निष्कामी मनुष्य को कोई प्रयोजन नहीं रहता फिर, और ऐसे मनुष्य को कर्मत्याग की कोई आवश्यकता नहीं रहती। ऐसे मनुष्य के लिए संसार में किसी प्रयोजन की सिद्धि हेतु आश्रय करने योग्य भी कुछ नहीं है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १८

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org