निन्दा कहाँ से? अहं का स्त्रोत?

निन्दक तो है नाक बिन, सोहै नकटी माहि।
साधुजन गुरुभक्त जो, तिनमे सोहै नाही॥

निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

~ गुरु कबीर

आचार्य प्रशांत: निंदक तो है नाक बिन। नाक से अर्थ है — मान, कीमत। उसकी अपनी कोई कीमत नहीं होती है। उसकी अपनी कोई कीमत नहीं हो सकती है, जिसमें निंदा का भाव हो, क्योंकि निंदा करने का अर्थ ही यही है कि पूरी बात देखी नहीं। जहाँ आधी-अधूरी तस्वीर दिखाई देगी, वहीं पर लगेगा कि कुछ ऐसा हुआ है जो नहीं होना चाहिए था। कोई ऐसा…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org