निडर होकर दुनिया का अनुभव कैसे करें?

प्रश्नकर्ता: डर जो होता है हमें हमेशा हो आउटवार्डली रखता है उसकी वजह से ये जो गहराई है यानी कि व्यवहार में एक तरह का संतुलन रहे, इधर के भी ज्ञान रहे और उधर का भी तब जा कर आप फिर एक तरफ के पूरी तरह से हो पाते हो (ऑल इन)

आचार्य प्रशांत: ऑल इन नहीं हो पाते हो, ये धारणा झूठी है! ‘डर’ भी तुमको पूरे तरीके से संसार का नहीं होने देता। ‘डर’ ही तो तुम्हें संसार का नहीं होने देता। संसार के प्रति तुम कोई भी भावना रखते हो, वो तुम्हें संसार का होने नहीं देती। तुम लोग अनुभवों की बात करते हो मैंने बार-बार कहा है कि “तुम अनुभव नहीं ले पाते; अनुभव ले पाने के लिए बड़ा खुलापन चाहिए।” तुम अनुभव में उतर ही नहीं पाते, अनुभव के प्रति तो तुम्हारे पास बड़े कवच हैं, बड़ी धारणाएँ हैं, बड़े अवरोध हैं, तुम्हें कहाँ कोई अनुभव हो पाता है?

अनुभव आता नहीं है कि तुम बिदकना शुरू कर देते हो अरे! कुछ हो जाएगा! दाग न लग जाए! आग न लग जाए! तुमने कोई अनुभव लिया है? कभी टूट के रोए हो? ऐसा रोए हो कि बिखर ही गए? थोड़ा-सा रो लेते हो, जैसे नाक बहे थोड़ी देर को। सावन बहा है कभी? हंसी, खुशी, प्रसन्नता जिसकी तलाश में रहते हो वो भी बहुत मिल जाती है तो घबरा जाते हो। थोड़ी देर में कहना शुरू कर देते हो- “बड़े बूढ़े बता गए हैं, विषयों में बहुत संलग्न मत होना!” इतनी खुशी मिल गई ना? ज़्यादा मत लेना! का बिट्टू तीन बार कर लिए? नहीं अब उठो चलो! तीन बार तक ठीक है, चौथी बार में करोगे तो भोगी कहलाओगे। तुम्हें कोई अनुभव पूरा होता है? बहुत जल्दी तुम्हारी वर्जनाएँ खड़ी हो जाती हैं।

मैं अंधाधुंध भोग की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उसकी बात कर रहा हूँ जो तुम्हें बहती हवा का भी पूरा अनुभव लेने नहीं देता। तुम खड़े हो बाजार में, तुम्हारे घुटनों बराबर कोई भिखारी बच्चा आकर तुम्हें छू जाता है, कंपन उठता है, एक लहर आती है तुमने देखा है? तुम उस लहर का कैसे गला घोटते हो? अब बच्चा गंदा है, दुर्बल है, पर बड़ा खूबसूरत है। तुम खड़े हो बाजार में, कोई भिखारी बच्चा, इतना ही है, तुम्हारे घुटनों तक आता है, आ के तुम्हें यहाँ छू गया, पांव में, उठा पाते हो उसे गोद में? बोलो? मौका था प्रेम का अनुभव लेने का, उस मौके को भुना पाते हो? बोलो?

तुम्हारे सामने कोई गायक गाता हो, कि कोई नर्तक नाचता हो, कि वक्ता बोलता हो और तुम्हारे झुर्झुरी छूटी जा रही है। तुम बिल्कुल आलोइत हुए जा रहे हो, तो भी तुम इतनी छूट देते हो अपने आपको? कि उठकर जाओ और उसके गले मिल जाओ, कि चूम लो उसको, कि उसके पांव पड़ जाओ? कोई अनुभव तुम अपने आपको होने कहाँ देते हो?

प्रेम का पल है और तुम सुध-बुध खोए दे रहे हो। तुमने देखा है? तुम कितने डरे हुए और झूठे आदमी हो! प्रेम के पलों में जब तुम्हारी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org