ना सुख का आलिंगन ना दुःख का प्रतिकार

हम करते क्या हैं कि अपने सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ती का साधन आध्यात्मिकता को बना लेते है।

तो मन की जैसी स्थिति होती है, जैसे उसके संस्कार होते हैं, जैसे उसपर प्रभाव चढ़े होते हैं, उसके अनुरूप विषय दिख गया तो नाम देते हो ‘सुख,’ उसके अनुरूप विषय नहीं दिखा, या उससे प्रतिकूल विषय दिख गया तो नाम देते हो, ‘दुःख।’ बस बात इतनी सी है। हमने पूरी दुनिया को दो ही हिस्सों में तो बाट रखा है, अनुकूल-प्रतिकूल और इसी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org