नादान परिंदे

ओ नादान परिंदे घर आजा, घर आजा।

क्यों देश-विदेश फिरे मारा क्यों हाल-बेहाल थका हारा क्यों देश-विदेश फिर मारा तू रात-बीरात का बंजारा ओ नादान परिंदे घर आजा।

~ फ़िल्म (रॉकस्टार)

प्रश्नकर्ता: उक्त पंक्तियों को मैं आजकल अपनी वैचारिक प्रक्रिया से जोड़कर देख रहा हूँ और पा रहा हूँ कि मन में विचारों की दौड़ पहले की तरह आती है, पर अब बीच में ही सजग हो जाता हूँ। और कभी-कभी इसे रोकने की कोशिश करता हूँ…

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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