ध्यान में साँस और विचारों को देखना कितना सार्थक है?

तुम्हारे सामने इतनी चीज़ें हैं इनको देखते हो, जो स्थूल हैं, प्रत्यक्ष हैं। भ्रम तुम्हारे कहाँ हैं, भूत तुम्हारा कहाँ हैं और तुम देखने की कोशिश कर रहे हो सांस को, और कुछ नहीं है देखने को।

विचार सूक्ष्म हैं, स्थूल को देख लिया जिसको देखना सहज और आसान है। तुम्हारा कमरा गंदा है और तुम्हें वह गंदगी नहीं दिखाई दे रही है और तुम कह रहे हो मैं तो मन की गंदगी देखूंगा, मैं तो विचारों का उठाना और गिरना देखूंगा।

क्यों अपने आप को बहला फुसला रहे हो, क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारे जीवन में वास्तविक समस्या क्या है? अपने जीवन की समस्याओं का सीधे-सीधे सामना क्यों नहीं करते, तुमने छुपने के, पलायन के छद्म उपाय क्यों ढूँढ लिए हैं?

ध्यान का अर्थ होता है उचित ध्येय बनाना और उचित ध्येय सिर्फ़ तब बनेगा जब ध्याता अपना पुराना रूप बचाए रखने पर तुला न हो।

ध्यानी तो सभी हैं पर प्रश्न यह है कि ध्येय किसको बनाया? ऐसा कोई नहीं है इस अखिल विश्व में जो ध्यानी न हो, अंतर बस ध्येय में है। जब तुम डरे होते हो तो तुम्हारा एक ही ध्येय होता है, बचना।

ध्यान उसपर लगाया जाता है जो उच्चतम हो। साँस तुम्हारी उच्चतम है क्या? मात्र सत्य पर ही ध्यान लगाया जा सकता है।

ध्यान का अर्थ होता है मैं सत्य में डूब कर जीवन को देखूँ, संसार को देखूँ।

अगर सांस नहीं देखोगे तो ज़िन्दगी देखोगे और ज़िन्दगी देखने में कष्ट होता है न, साँस देखना तो सुविधापूर्ण है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org