ध्यान का प्रयत्न ही बंधन है

निःसंगो निष्क्रियोऽसि

त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।

अयमेव हि ते बन्धः

समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥

आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥

~ अष्टावक्र गीता

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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