धर्मग्रंथों की उपेक्षा धर्म को मिटाने की तैयारी है

हम जैसे जी रहे हैं, वैसे जी नहीं पाएँगे अगर हम चले गए उपनिषदों या गीताओं के पास। साथ ही साथ हममें इतना दम नहीं है कि कह सकें कि हम पाशविक हैं और हमें पशु जैसा ही भौतिक जीवन जीना है।

काल का कुछ ऐसा दुर्योग बैठा है, समय ने कुछ ऐसी करवट ली है, एक ऐसे मुकाम पर पहुँच गया है, जहाँ ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई दंड नहीं मिलेगा, कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा अगर आप पूरे तरीके से एक सत्यहीन…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org