दूसरों पर निर्भर रहना बंद करो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत अच्छा लग रहा है यहाँ शिविर में आकर। ऐसा घर पर अनुभव नहीं होता। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: दो-चार बातें हैं, सब ध्यान से सुनो। पहली बात तो ये कि — सही जगह पर जितना समय गुज़ारोगे, भ्रामक और अशांत जगह पर वक्त गुज़ारना उतना मुश्किल होने लगेगा तुम्हारे लिए। तो यह हमने पहली बात कही। क्या? कि सही जगह पर जितना वक्त गुज़ारोगे, अशांतिपूर्ण जगह पर वक्त गुज़ारना तुम्हारे लिए उतना मुश्किल होने लगेगा। दूसरी बात ये कि — अक्सर सही जगह पर थोड़ा वक्त गुज़ारना अंदरूनी साज़िश होती है गलत जगह को बरकरार रखने के लिए। आप कहते हो कि, “एक संतुलन बना दिया न। मैं कोई पूरी तरह से भ्रमित या बहका हुआ थोड़े ही हूँ। मैं बीच-बीच में शिविरों में शिरकत करता रहता हूँ।” तो, शिविरों में जाना, अपनी जो बाकी उलझी हुई और बहकी हुई दिनचर्या है, उसको यथावत रखने का बहाना और कारण बन जाता है। ऐसे में आप शिविर से कोई गहरा लाभ उठा नहीं पाओगे, क्योंकि आप शिविर में इसलिए जा ही नहीं रहे हो कि आप शिविर के हो जाओ। आप शिविर में जा ही इसलिए रहे हो ताकि थोड़ी थकान मिटा लो, थोड़े ताजे हो जाओ। और वापस आकर के पुनः अपनी पुरानी दुनिया में डूब जाओ।

जब आदमी इस तरह का विभाजन करता है कि अट्ठाईस दिन काम के और दो दिन अध्यात्म के, तब उन अट्ठाईस दिनों में सब मैला-मैला, काला-काला हो जाता है। क्योंकि आप चाहते हो कि इस तरीके का एक तीक्ष्ण विभाजन हो जाए। और इन दो दिनों में आपको सब कुछ उजला-उजला, धवल-धवल, साफ-साफ बनाना ही पड़ता है। आपने इस विभाजन को परिभाषित ही ऐसे किया है कि, “मेरी कामकाजी दुनिया, मेरी सामान्य दुनिया, वहाँ लोग ज़रा गंदे-गंदे हैं। उनके साथ मेरा मन नहीं लगता। और उससे भागकर के मैं कभी-कभार शिविरों में आता हूँ। यह बड़ी अच्छी और प्यारी-प्यारी दुनिया है। यहाँ मेरा मन खूब लगता है।” तो फिर यहाँ के सब लोग तुम्हें अच्छे लगेंगे और वहाँ के सब लोग तुम्हें बुरे लगेंगे। यहाँ के सब लोग तुम्हें अच्छे लग ही इसलिए रहे हैं क्योंकि उनके साथ दो ही दिन रहना है और तुमने तय कर रखा है कि दो दिन के बाद विदाई है। इन्हीं लोगों के साथ हफ्ता गुज़रो, तो इनमें से ही कुछ तुम्हें बुरे लगने लगेंगे। ये तुम अपने लिए व्यर्थ का एक द्वैत खड़ा कर रहे हो, और ये द्वैत कुछ नहीं है, एक चक्की है, दो फांक हैं। विभाजन का काम ही यही होता है न, दो फांक बना देना। दो हिस्से हो गए, ये चक्की चलती रहेगी — जीवन इसमें पिसता रहेगा, समय व्यर्थ जाता रहेगा।

तुम यहाँ समय गुज़ारोगे और अपनेआप को बताओगे कि बहुत अच्छा समय था, बहुत बढ़िया समय था — लेकिन तुम्हारा यहाँ के यथार्थ से कोई संबंध नहीं होगा। तुम एक काल्पनिक, उज्जवल, धवल छवि गढ़ लोगे कि जगह बहुत अच्छी थी, समय बहुत अच्छा गुज़रा, बड़ा मीठा, बड़ा…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org