दुःख — सुख की स्मृति

संसार के दो लक्षण:

पहला - सुख की उम्मीद खूब देगा, सुख नहीं, क्योंकि वास्तविक सुख तो आनंद है। वो संसार नहीं दे पाएगा।

हम आमतौर पर जिसे सुख बोलते हैं, उसे ध्यान से देखिये। क्या वो कभी पूरा होता है? कोई ऐसा सुख मिला है आपको जिसने भविष्य को ख़त्म कर दिया हो? क्या कोई ऐसा सुख उपलब्ध हुआ है आपको जिसके आगे और सुख पाने की आशा न बचे? समय कायम रहता है न? भविष्य कायम रहता है न? आपको कितना भी सुख मिल जाए, ‘और’ की चाहत बनी ही रहती है।

तो साफ़ समझिये कि जगत आपको सुख नहीं देता, भविष्य देता है, क्योंकि अभी आगे की चाहत बनी हुई है। दूसरे शब्दों में, जगत आपको सुख नहीं, सुख की उम्मीद देता है। जगत के पास जाओगे तो सुख की उम्मीद खूब बढ़ जाएगी, आनंद नहीं मिलेगा।

दूसरी बात — सुख की उम्मीद का ही दूसरा नाम दुःख है। तो जगत आपके भीतर उम्मीद खूब पैदा कर देता है, वही उम्मीद जब मन की व्याधि बनती है, जब आपको दुःख देती है, तब उस दुःख का निराकरण नहीं कर पाता।

दुःख क्या है? सुख की कामना ही दुःख है, कोई अलग-अलग थोड़े हैं दोनों, सुख की स्मृति ही दुःख है। जिसे सुख चाहिए, वही तो दुखी है, दुखी न होता तो सुख क्यों माँगता? संसार क्या दे रहा है आपको? सुख। सुख माने, ‘सुख की उम्मीद’। और जहाँ उम्मीद है, वहाँ क्या है? दुःख। संसार यह दे रहा है आपको।

यह हटेंगे कैसे?

जगत विचार दे सकता है। जगत वहाँ नहीं ले जा पाएगा आपको, जहाँ निर्विचार है, जहाँ दुःख नहीं है। और याद रखिये, जहाँ दुःख नहीं है, वहाँ सुख भी नहीं है। कोई यह न सोचे कि दुःख के न होने का अर्थ होता है सुख। दुःख के न होने का अर्थ होता है, सुख भी नहीं, और सुख-दुःख जहाँ दोनों नहीं हैं, उसी स्थति को ‘आनंद’ कहते हैं।

आनंद को सुख मत सोच लीजियेगा। आनंद का सुख से कोई लेना देना नहीं है। सुख नकली है, सुख कल्पना है, सुख विचार है, सुख द्वैत में है और आनंद स्वभाव है, सत्य है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org