दार्शनिकता

जाड़े की सुबह को,

बैठा हूँ मैं बाहर धूप में,

जब एक भूरा कुत्ता और काला कौवा

आकर कुछ इस तरह बैठ जाते हैं-

मेरे ठीक सामने तो नहीं-

पर किसी कोण से लगातार दिखाई देते रहते हैं।

भूरा कुत्ता बहुत कुछ सड़क पर पड़ी

गंदगी जैसा लगता है-

जिसे सूँघता है वो खुद

और काला कौवा आकाश पर छाए

उसी काले धुंआ की तरह

जिसमें उड़ता है वह खुद ।

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org