तुलना करना ठीक? लक्ष्य बनाना ठीक?

प्रश्नकर्ता: सर, कोई भी इंसान अपने में यूनीक (अनूठा) होता है। मतलब ये कि जब किसी की किसी से तुलना की जाती है, तब वो कमज़ोर या ताक़तवर होता है। तो अभी आपने जैसा बोला कि आपस में तुलना नहीं करनी चाहिए। तुलना करेंगे तो कोई चीज़ कमज़ोर प्रतीत होगी और कोई चीज़ ताक़तवर दिखेगी।

आचार्य प्रशांत: नहीं, तुलना वहाँ करो जहाँ तुलना की जा सकती हो। अब जलेबी को ही ले लो। अगर एक किलो जलेबी ख़रीद रहे हो तो तुलना कर सकते हो न कि तराजू पर इधर एक किलो का बाट रखा है, उधर जलेबी रखी है, तुलना हो गयी। अब यहाँ पर तुलना करना ठीक है। किलोभर ख़रीदी तो किलोभर आयी कि नहीं आयी? यहाँ ठीक है पर अब तुम ऐसी चीज़ों की तुलना करो, जहाँ हो नहीं सकती — अभी हमें एक यहाँ पर एक चिड़िया मिली, छोटी सी है, उसे वहाँ रख दिया है और यहाँ मछली है, अब तुम कहो कि ‘वो चिड़िया तैर क्यों नहीं पा रही मछली की तरह?’ तो ये ग़लत तुलना हो गयी न। (श्रोतागण हँसते हैं)

दो हवाई जहाज़ हैं। एक है, ‘हरक्यूलीस सी-फिफ्टीन’ , जानते हो? वो इतना बड़ा होता है कि उसमें टैंक भरकर ले जाते हैं। और एक फाइटर प्लेन (लड़ाकू विमान) है छोटा सा। बहुत छोटा सा होता है, ‘तेजस’ होता है इतना कि यहाँ-से-यहाँ तक का (इशारा करते हुए)। अब तुम तुलना करके बोलो कि ये जो फाइटर प्लेन है ये तो बर्बाद है, इसमें तो दम ही नहीं है, इतना छोटा है। और वो हरक्यूलीस देखो, कितना विशाल है। ये तुलना व्यर्थ है न। क्यों व्यर्थ है? क्योंकि फाइटर प्लेन का काम दूसरा है भाई! उसको उतना बड़ा होना ही नहीं है। उतना बड़ा होगा तो गति नहीं पकड़ पाएगा, एजाइल (फुर्तीला) नहीं रह पाएगा, मार दिया जाएगा।

बात समझ में आ रही है?

तो तुलना हमेशा किसी सन्दर्भ में होती है। पहले तो ये देख लो कि सन्दर्भ ठीक भी है या नहीं है, उसके बाद तुलना करो। अब वो कुत्ता है और वो बकरी है। तुम क्या तुलना करोगे? कि कुत्ता कितना दूध देता है? कितनी मूर्खतापूर्ण तुलना है न? (श्रोतागण हँसते हैं)

सिविल इंजीनियर है, कम्प्यूटर इंजीनियर है। सिविल वाला उससे पूछ रहा है, अच्छा बताओ, सीमेन्ट कितनी तरह के होते हैं? वो नहीं बता पा रहा है तो उससे बोल रहा है, तुम तो सबसे नीचे के इंजीनियर हो, तुमसे घटिया कोई इंजीनियर हो ही नहीं सकता। तुम्हें सीमेन्ट का कुछ पता ही नहीं है। भाई उसे क्यों पता हो? हमारे यहाँ फर्स्ट सेमेस्टर वाले को भी पता होता है। और तुम्हें कम्प्यूटर साइंस फाइनल ईयर में आकर सीमेन्ट का कुछ पता ही नहीं है। भाई क्यों पता हो उसको? उसके काम की चीज़ नहीं है।

सबका अपना-अपना एक सन्दर्भ होता है। अगर सन्दर्भ तुम्हें दिखायी ही दे जाए तो तुलना उपयोगी है, तुलना प्रासंगिक है। तो कर लो तुलना फिर कोई बुराई नहीं है पर…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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