तुम ही सुख-दुःख हो

जिसकी सुरती जहाँ रहे, तिसका तहाँ विश्रामभावै माया मोह में, भावै आतम राम– संत दादू दयाल

वक्ता : क्या कहते हैं कबीर भी?

“जल में बसे कुमुदनी, चंदा बसे आकाश जैसी जाकी भावना, सो ताही के पास”

यह बिल्कुल वही है जो अभी दादू न कहा । तुम जीवन में कहाँ हो, कैसे लोगों से घिरे हो, कौन तुम्हें मिला है, किसके पास हो, “जैसी जाकी भावना सो ताही के पास” । “जिसकी सुरती जहाँ रहे तिसका तहाँ विश्राम,”…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org