तुम्हारे लिए जगत न मिथ्या है, न मिथ्या कहो

प्रश्नकर्ता(प्र): सर, कई बार एसा होता है कि ये जो बात है कि माइंड जो कुछ भी दिखा रहा है वो सब झूठ है, इसको माइंड नकार देता है। पर फिर बैठ के सोचते हैं तो इस दुनिया का कोई आधार भी समझ नहीं आता।

आचार्य प्रशांत(आचार्य): नहीं, ‘झूठा’ जो है न, वो तो मन की एक परिकल्पना होती है। जब आप मन को कोई चीज़ बोलते हो कि झूठी है, तो वो उसको उसी अर्थ में जांचता है जिस अर्थ में उसने ‘झूठा’ शब्द समझ रखा है। अब…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org