तुम्हारी मुक्ति से बड़ा कुछ नहीं

अध्यात्म में व्यस्क पुरुषों की ज़रुरत होती है, मर्दों की। अनाड़ी लड़कों की नहीं। ये लड़कपन के काम हैं कि — मुक्ति को लेकर कल्पना कर रहे हैं। और फिर पकड़े गए तो हँस रहे हैं। कल्पनाओं में जीने की इतनी आदत हो गई है कि मुक्ति की भी कल्पना करते हो।

मुक्ति समझते हो क्या है?

कल्पना से मुक्ति।

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org