ताकतवालों का बोलबाला है, भगवान कमज़ोरों की मदद क्यों नहीं करते?

ताकतवालों का बोलबाला है, भगवान कमज़ोरों की मदद क्यों नहीं करते?

प्रश्नकर्ता: दुनिया में ताकतवर लोगों का ही क्यों बोलबाला है? कमज़ोर और गरीब को हर जगह दबाया क्यों जाता है? भगवान कमज़ोरों की मदद क्यों नहीं करते?

आचार्य प्रशांत: भगवान कमज़ोरों की मदद लगातार कर रहे हैं उनकी कमज़ोरी बन कर। तुम्हें जो कुछ भी मिला हुआ है वो भगवान के द्वारा मदद के तौर पर ही मिला हुआ है। बात को समझना थोड़ा।

कोई ताकतवर है, जैसा तुमने कहा, उसको ताकत मिली हुई है। कोई कमज़ोर है, उसको कमज़ोरी मिली हुई है। किसी को पैसा मिला हुआ है, किसी को गरीबी मिली हुई है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे कुछ नहीं मिला हुआ। किसी को ज्ञान मिला है, किसी को अज्ञान मिला है। किसी को घर मिला है, किसी को सड़क मिली है। किसी को भूख मिली है, किसी को रोटी मिली है। किसी को रंग काला मिला है, किसी को गोरा मिला है।

ऐसा तो कोई नहीं है न जिसको कुछ भी ना मिला हो? अगर कोई ऐसा होता जिसको कुछ भी नहीं मिला है तो वह इंसान ही नहीं होता। हर व्यक्ति के कुछ गुण होते हैं न, कुछ पहचाने होती हैं। तो माने हर व्यक्ति को कुछ-न-कुछ मिला हुआ है। किसी को कुर्ता, किसी को पजामा। किसी को समुद्र और किसी को ज़मीन। किसी को बिस्तर और किसी को दफ्तर। जिसको जो मिला है वो उसी को समझ लो कि वो ईश्वरीय मदद है। कैसे? कुछ भी मिला हो तुम्हें, पूरा पड़ रहा है क्या?

तुमने सवाल पूछा है यहाँ पर कि, “मैं कमज़ोर हूँ इसलिए बड़ा दुखी हूँ। दुनिया में ताकतवर लोगों की ही चलती है।” और सैंकड़ों, हज़ारों ताकतवर लोग आते हैं यहाँ। वो कहते हैं ये ताकत ही छाती का बोझ है, गले की फाँस है। बाहर वालों को लगता है कि ताकत बड़ा सुख देती होगी, हम जानते हैं कि ये ताकत हमारा सब कुछ नष्ट किए दे रही है।

ये बात उन्हें नहीं समझ में आएगी जिनके पास ताकत नहीं है क्योंकि ताकत का कष्ट वही भोग रहे हैं जिनके पास ताकत है। तुम जिस अर्थ में ताकत शब्द का प्रयोग कर रहे हो उसी अर्थ में बात कर रहा हूँ। तुम्हारे लिए ताकत का अर्थ है सामाजिक प्रतिष्ठा, सत्ता, पैसा, ये सब तुम्हारे लिए ताकत के प्रतीक हैं। तो मैं उसी अर्थ में ताकत का प्रयोग कर रहा हूँ। जिसको जो मिला है उसको वही पूरा नहीं पड़ रहा, और जिसको जो मिला है वो उसके विपरीत की आस लगाए हुए है और उसके विपरीत की प्रशंसा कर रहा है।

जब जवान होते हो तुम तो प्रौढ़ों की तरफ देख-देख करके आहें भरते हो, कहते हो “हमें देखो, न घर के न घाट के। न बच्चे कहलाते हैं न व्यस्क। न यही हालत कि घर में बैठ करके आराम से माँ के हाथ की रोटी खा लें और न ऐसा ही है कि भरपूर कमा रहे हों।”

जवान लोगों से ज़्यादा अपनी स्थिति के प्रति असंतुष्टि शायद ही किसी में देखी जाती…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org