डरो नहीं, तुम सुरक्षित हो

आदमी के विकास की सारी यात्रा उसके अपने स्वभाव के विरोध की यात्रा है।

विकास अस्तित्व से शत्रुता का नाम है और यही कारण है कि आज आदमी का विकास वहाँ पहुँच गया है जहाँ अस्तित्व समूल विनाश पर खड़ा है।

आदमी जितना विकसित होगा प्रकृति का उतना विनाश होगा क्योंकि विकास की हमारी परिभाषा ही यही है, विरोध।

जो कुछ भी प्राकृतिक है, उसका विरोध करना ही हमारे लिए विकास है।

यही विरोधी मानसिकता, यही विरोधपूर्ण मानसिकता, हमें गहराई से डरा के रखती है। यह श्रद्धाहीनता है, यह अहंकार है।

हमारे मन में छवि कुछ ऐसी रहती है कि पूरा अस्तित्व हमें नुकसान पहुँचाने के लिए आतुर है और हमें अपनी रक्षा करनी है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org