टॉक्सिक (Toxic, ज़हरीला) इंसान किसे मानें? ऐसे लोगों से बचें कैसे?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की हिन्दू कॉलेज की स्टूडेंट (छात्रा) हूँ। कैम्पस (परिसर) में जब भी किसी से ग्रुप (समूह) में या इंडिविजुअल लेवल (व्यक्तिगत स्तर) पर किसी से बात हो रही होती है, तो कन्वर्सेशन (वार्तालाप) का पहला बैरियर (बाधा) होता है कि वार्तालाप में कोई कड़वी बातें नहीं होनी चाहिए, केवल मीठा-मीठा बोलना है। और ज़रा-सा किसी इशू (मुद्दे) पर थोड़ा प्रेस करके (ज़ोर डालकर) किसी को कुछ बोल देते हैं तो वो कहते हैं — ‘*इट्स माइ चॉइस, डोंट जज मी*।’ (यह मेरा चुनाव है, आलोचना मत करो) और आजकल एक नया टर्म (पारिभाषिक शब्द) आ गया है कि वो कहते हैं कि ‘*स्टॉप एटैकिंग मी, डोंट अटैक मी’ (मुझ पर आक्रमण करना बंद करो)।

तो मैं कबीर साहब को पढ़ रही थी, वो कह रहे थे कि ‘निंदक नियरे राखिए’। एक तरफ़ वो कहते हैं कि टॉक्सिसिटी नहीं होनी चाहिए, नेगटिविटी (नकारात्मकता) मत लाओ, तो वो भी सही लगता है। और यहाँ पर बात हो रही है कि ‘निंदक नियरे राखिए’ तो ये भी सही, पॉज़िटिव (सकारात्मक) लगता है क्योंकि जो खोट निकालेंगे, उनको पास रखेंगे तो हम बेहतर होते चलेंगे। तो इसमें मैं आपसे समझना चाह रही थी कि टॉक्सिसिटी मतलब होता क्या है और एक टॉक्सिक पर्सनैलिटी (ज़हरीला व्यक्तित्व) क्या होती है?

आचार्य प्रशांत: टॉक्सिसिटी माने विषैलापन। टॉक्सिक होना माने ज़हरीला होना, है न? साधारण सी बात है।

ज़हर क्या होता है? कब कहते हो कोई चीज़ ज़हरीली है? जब वो जीवन को मार दे। तो जो चीज़ एंटी लाइफ़ (जीवन विरुद्ध) हो उसको टॉक्सिक बोलते हैं, है न? जो चीज़ ज़िन्दगी के खिलाफ़ जाती हो उसको बोलेंगे टॉक्सिक , ज़हरीली, विषैली वग़ैरा-वग़ैरा। तो क्या टॉक्सिक है और टॉक्सिक पर्सनैलिटी क्या होती है, ये सब जानने के लिए पहले ये ज़रूरी है न जानना कि ज़िन्दगी क्या होती है। जब आपको पता होगा कि जीवन किसको कहते हैं, जीना किसको कहते हैं, तभी आप ये जान पाओगे कि टॉक्सिसिटी किसको कहते हैं।

जीना किसको कहते हैं? अब हम अच्छे तरीक़े से जानते हैं कि दो तरह की चीज़ें होती हैं जिनको ज़िन्दगी कहा जा सकता है और दोनों अलग-अलग होती हैं। एक तो यह जो हमारा शरीर है, पूरा फिज़िकल ऐपरैटस (भौतिक उपकरण)। यह चल-फिर रहा हो, यह अपने नैचुरल माने प्राकृतिक तरीक़े से काम कर रहा हो तो हम कह देते हैं कि ज़िन्दा है। तो एक ज़िन्दगी हुई वो जो पूरे तरीक़े से प्रकृति से बंधी हुई है, ठीक है? और जो ज़िन्दगी प्रकृति से बंधी होती है उसका लक्ष्य क्या होता है?

यह बिलकुल गणित के ईक्वेशन्स (समीकरणों) की तरह चलेगा तो ध्यान से साथ-साथ चलना पड़ेगा लेकिन जो बात समझ में आएगी वो बड़े महत्त्व की होगी। तो ये जो प्रकृति से बंधी ज़िन्दगी होती है…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org