टुकड़ा टुकड़ा मन!

टुकड़ा टुकड़ा मन

धरती फाटे, मेघ मिलै, कपडा फाटे डौर,

तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर।

~ संत कबीर

वक्ता: धरती फट गई हो, ऐसा ताप पड़ा हो कोई वर्षा न हुई हो और धरती फट उठी हो। तो इलाज संभव है। मेघ आएगा और सींच देगा। फटी धरती दुबारा नम हो जाएगी। बड़ी समस्या नहीं है कोई। पदार्थ की बात है, पदार्थ ही आ करके हल कर देगा। ‘*कपडा फाटे डौर *’-फट गया है कपड़ा, तो सुईं, धागा, डोरी, काम हो जाएगा। फिर कोई बड़ी समस्या…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org