झूठा होश

प्रश्न: आचार्य जी, ‘झूठा होश’ का क्या अर्थ होता है?

आचार्य प्रशांत: हम जिसको ‘होश’ कहते हैं वो क्या है? आप जब कहते हो कि आप ‘होश’ में आ गए, तो आप किस स्थिति की बात कर रहे होते हो? रात में आप सो रहे हो। जब आप सो रहे हो तो आपका दावा नहीं है कि आप ‘होश’ में हो। सुबह आँख खुलती है और आप कहते हो? कि मैं ‘होश’ में आया। ये सुबह आँख का खुलना आपको किस स्थिति में ले आता है? क्या शुरू हो जाता है आपके साथ?

श्रोता: हम देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं।

आचार्य जी: आप देख सकते हो, महसूस कर सकते हो, और आपकी नियमित दिनचर्या शुरू हो जाती है। कैसी है वो दिनचर्या? कैसी है वो दिनचर्या? समझ बूझ से भरी हुई है? उसमें कृष्णों की वाणी है? उसमें बुद्ध की आज़ादी है? मीरा का नृत्य है उसमें? जिसे आप अपनी ‘होश’ से भरी दिनचर्या बोलते हो, वो कैसी है? आँख खुलने के बाद आपकी जो स्थिति हो जाती है वो कैसी है? आपके मन में अनहद गूंजता है या आपके मन में तमाम तरीके के भय, शंकाएँ और व्यर्थ विचार उठते हैं ? सुबह उठने के बाद क्या होता है आपको? उठ कर के अपूर्व शान्ति में जीते हो? या उठते ही याद आता है कि फलाना काम बाकी है, फलानी चीज़ छिनी जा रही है, यहाँ भागना है, वहाँ जाना है।

बोलो?

क्या होते हो? हम जिसे ‘होश’ कहते हैं वो चीज़ क्या है?

हम जिसे ‘होश’ कहते हैं, वो हमारे लिए बहुत बड़ा बोझ है। वही दुश्मन है हमारा।

और यही कारण है कि जब थक जाते हो तो पुनः सोने चले जाते हो। क्योंकि जिसे तुम ‘होश’ कहते हो वो तुम्हें थकाता है।

फिर उस ‘होश’ से परेशान हो कर तुम कहते हो इससे भली तो बेहोशी है, फिर तुम सोने चले जाते हो। देखा है, तनाव जब बढ़ जाता है तो क्या करते हो? सोने चले जाते हो, और फिर शान्ति मिलती है।

तुम जिसे ‘होश’ कह रहे हो, वो ‘होश’ है ही नहीं। तो इसलिए अच्छा ही है कि भजन तुम्हें बे-होश कर दे। आपकी ‘होश’ की परिभाषा ही विरूपित है। हम जिसे अपनी साधारण ‘होश’ भरी चेतना कहते हैं, उसमें कहाँ है ‘होश’?

सड़क पर चलते आम आदमी को देखो ना, अपनी दृष्टि में वो होशमंद है, पर वो क्या कर रहा है? कहाँ जा रहा है? वो हिंसा से भरा हुआ है, उसकी आँखों पर जाले हैं, उसकी चाल लड़खड़ाई हुई है, उसे तुम होशमंद कहोगे? और अगर वो होशमंद है, तो बुद्ध क्या थे? और

अगर ‘होश’ इतनी सस्ती चीज़ है कि आँख खोलते ही सुबह मिल जाती है, तो उन ऋषियों का क्या हुआ जिन्होंने फिर अथक अनंत साधना करी, ‘होश’ पाने के लिए।

‘होश’ अगर ऐसी चीज़ होती कि प्रातः आँख खोलने भर से प्रकट हो जाती, तो इसी गंगा के तट पर ऋषियों को क्यों अथक साधना करनी पड़ी ‘होश’…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org