ज्ञान नहीं, जीवन!

ज्ञान नहीं, जीवन

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं नौवीं कक्षा में था तब से ओशो को, एक बुक (पुस्तक) मिली थी मुझे लाइब्रेरी (पुस्तकालय) में गाँव के, तब से मैं पढ़ रहा हूँ उनको। फिर मेरी सरकारी नौकरी लगी तो मुझे लगा कि नौकरी से सब अच्छा हो जाएगा और मैं अध्यात्म को और भी समय दे पाऊँगा। लेकिन फिर धीरे-धीरे समझ आया कि समय तो रहा ही नहीं, सिर्फ़ पैसे ही मिल रहे हैं, लेकिन जो पहले भी मैं कुछ कर लेता था, ध्यान, कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ, और सिर्फ़ पैसों के लिए मैं जाता हूँ।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org