जो भीतर से मुक्त है, वही बाहर से संघर्ष कर पाएगा

श्रीदुर्गासप्तशती पर

आचार्य प्रशांत: तीसरे और उत्तर चरित्र का तेहरवाँ और अंतिम अध्याय।

ऋषि कहते हैं — “राजन! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया। जो इस जगत को धारण करती हैं, उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है। वे ही विद्या उत्पन्न करती हैं। भगवान विष्णु की मायास्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। आराधना करने पर वे ही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं।”

मार्कण्डेयजी कहते हैं — “क्रौष्टुकिजी! मेधामुनि के ये वचन सुनकर राजा सुरथ ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग महर्षि को प्रणाम किया । वे अत्यंत ममता और राज्यापहरण से बहुत खिन्न हो चुके थे। महामुने! इसलिए विरक्त होकर वे राजा तथा वैश्य तत्काल तपस्या को चले गए और वे जगदंबा के दर्शन के लिए नदी के तट पर रहकर तपस्या करने लगे।”

“वे वैश्य उत्तम देवीसूक्त का जप करते हुए तपस्या में प्रवृत्त हुए। वे दोनों नदी के तट पर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और हवन आदि के द्वारा उनकी आराधना करने लगे। उन्होंने पहले तो आहार को धीरे-धीरे कम किया, फिर बिल्कुल निराहार रहकर देवी में ही मन लगाए एकाग्रतापूर्वक उनका चिंतन आरम्भ किया। वे दोनों अपने शरीर के रक्त से प्रोक्षित बलि देते हुए लगातार तीन वर्ष तक संयमपूर्वक आराधना करते रहे।”

प्रोक्षितव्य होता है वह जो बलि के काम आता हो। तो बलि क्या है, यह यहाँ से भी स्पष्ट हो रहा है, ‘वे दोनों अपने शरीर के रक्त से प्रोक्षित बलि देते हुए’। अपने शरीर को गलाओ, अपने ही शरीर को प्रोक्षितव्य बनाओ। तो बलि का सम्बंध तुमसे है, बाहर के किसी जानवर वगैरह को मारकर बलि मत कर देना। राजा और वैश्य ने किसी पशु कि नहीं बलि दी, किसकी बलि दी? अपने ही शरीर की बलि दी।

“इसपर प्रसन्न होकर जगत को धारण करने वाली चंडिका देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा।”

देवी बोलीं — “राजन! तथा अपने कुल को आनंदित करने वाले वैश्य! तुम लोग जिस वस्तु की अभिलाषा रखते हो, वह मुझसे माँगो। मैं संतुष्ट हूँ, अतः तुम्हें वह सब कुछ दूँगी।”

मार्कण्डेयजी कहते हैं — “तब राजा ने दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य माँगा तथा इस जन्म में भी शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लेने का वरदान माँगा।”

देवताओं जैसे हैं राजा। राजा ने क्या माँगा? दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य दो और इस जन्म में भी शत्रुओं की सेना को…

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org