जो तुम्हें अशांत करे, सो गलत

श्रोता: आपने बोला कि गलत या बुरे को गलत बोलना सही होता है, लेकिन जब भी मैं ये करती हूँ, तो मैं ज़्यादा अशांत करती हूँ, जितनी किताबें मैंने अभी पढ़ी हैं या फिर पेरेंट्स ने जो सिखाया अगर आप कुछ गलत में भी अच्छाई ढूंढ सकते, तो वो ज़्यादा शान्तिदायक लगता है|

वक्ता: वो समायोजित होने की, एडजस्टेड होने की एक विधि है।गलत का अर्थ समझना, तुमने पूछा कि “एक ओर तो बात ये है कि गलत को गलत बोलो और दूसरी ओर ये कि नहीं, गलत में भी कुछ भला ढूंढो, कुछ सही ढूंढो|” दो तरह के अनुभव होते हैं जिन्हें आप गलत का नाम दे सकते हैं, एक तो आप उस सब को गलत मानें, जिसको गलत मानने की आपको शिक्षा दी गयी है। आपको बता दिया गया है कि किसी दिशा में पाओं करके नहीं सोना ये गलत है, आपको बता दिया गया है कि उक्त प्रकार का खाना नहीं खाना है ये गलत है, आपको बता दिया गया है कि विपरीत लिंग से इस तरह की अंक प्रकार की बात नहीं करनी है ये गलत है, या कि यदि आपके पास इस तरह की दैनिक जीवनचर्या नहीं है या इतने पैसे नहीं है, तो ये गलत है|

तो एक तो ये सब धारणाएं आती हैं जिनमें से कुछ को सही कहा जाता है, कुछ को गलत कहा जाता है।एक तो सही गलत का निर्धारण ऐसे होता है, ये सांसारिक तरीका है।जब मैं कह रहा हूँ कि, ‘गलत को गलत बोलो’ तो मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि उसको गलत बोलो, जिसको गलत बोलना तुम्हें संसार ने सिखाया है। फिर तो तुम बुद्ध को गलत ही बोल रहे होगे क्योंकि संसार ने तुमको सिखाया है कि इस तरीके से जिम्मेदारियाँ छोड़ के नहीं चले जाते।तो एक सही गलत वो होता है, जो तुम्हें संसार सिखाता है और एक दूसरा गलत होता है।वो गलत होता है कि जो एक मात्र चीज़ है, जिसे सही कहा जा सकता है, तुम उससे दूर हो गए|

वो है तुम्हारी मूल शान्ति, वो है तुम्हारी मूल निष्क्रियता, सत्व, बोध।मैं उसको कह रहा हूँ कि जब वो घटना घटे, तो जानो कि वो गलत है और मात्र वही गलत होता है।वो सब गलत नहीं है, जिसे तुम गलत बोलते हो, तुम गलत बोल देते हो अगर तुम्हारी टीम क्रिकेट मैच हार गयी, तुम गलत बोल देते हो अगर तुम्हारे जितने चाहते थे परीक्षा में उतने नंबर नहीं आए।ठीक है न? तुम उन सब बातों को गलत बोल देते हो, तुम हल्की बातों को सही या गलत बोल देते हो।

वास्तव में गलत सिर्फ एक को बोलो, किसको? कि तुम वो नहीं रह पाए जो तुम हो, जो तुम्हें होना था।सिर्फ़ वो गलत है, बाकि सब जो हम सही-गलत बोलते रहते हैं, वो कूड़ा बराबर है; न वो सही है न वो गलत है।वो सब काम चलाऊ बातें हैं।बात समझ रहे हो कि नहीं? तुम चाहते थे कि बिजली आ जाए, बिजली आ गई; तुम क्या बोल देते हो? “सही|” तुम चाहते थे कि तुम बीमार न हो, तुम बीमार पड़ गए; तुम क्या बोल देते हो? गलत।ये सब व्यवहारिक बातें हैं, काम चलाऊ बातें हैं।मैं इनकी चर्चा ही नहीं कर रहा, इसमें…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org