जीवन को गम्भीरता से कैसे ले सकते हो?

वक्ता: ये जो तुम हो, कितने साल लेकर आये हो? जितने भी लेकर आये हो उसमें से एक-तिहाई, एक-चौथाई तो गये। या नहीं गये? चार दिन थे तो एक गया, कुछ के साथ हो सकता है दो चले गये हों, कुछ के हो सकता है चार में से साढ़े तीन भी जा चुके हों।

(सभी श्रोता हँसते हैं)

कोई भरोसा नहीं, तो क्या गंभीरता से ले रहे हो? क्या बचाना चाहते हो? बचाते-बचाते एक दिन साफ़ हो जाओगे। बचेगा क्या? अरे जीवन भर…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org