जब महिला करे पुरुष का शोषण

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल एक रिकोर्डिंग देखी जिसमें एक महिला एक शांत दिखने वाले और एक गरीब आदमी को सरेआम पीट रही थी। कोई बीच-बचाव करने नहीं आया और शायद पुलिस भी उस आदमी को ही फँसा रही है। मेरे पुराने घाव उघड़ आए क्योंकि मैं भी झूठे दहेज के मामलों में अपनी पूर्व पत्नी से बहुत मानसिक, आर्थिक और कानूनी अत्याचार सह चुका हूँ। सर, आप अपनी शिक्षाओं में अक्सर महिलाओं का ही पक्ष लेते हैं और महिलाओं के सशक्तिकरण की कोशिश करते हैं और पुरुषों के शोषण के मामलों पर आप कुछ नहीं बोलते।

आचार्य प्रशांत: मैं महिला सशक्तिकरण की बात करता हूँ क्योंकि इस देश में अधिकांश महिलाएँ अभी भी ऐसी हैं जिन्हें सहारे की, समर्थन की बहुत ज़रूरत है। लेकिन मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ कि अब आधुनिक, पढ़ी-लिखी महिलाओं का एक वर्ग उभर कर आया है पिछले दस-बीस सालों में जहाँ रोल-रिवर्सल (भूमिका बदलाव) हो गया है। कि जहाँ पर पहले ये होता था कि पुरुष शोषक होता था और स्त्री पर शोषण होता था वहाँ पर अब स्त्री शोषक के किरदार में आ गई है। पर ऐसा कम है, ज़्यादा स्थिति अभी यही है कि महिलाएँ उत्पीड़ित हैं और उनको समर्थन मिलना चाहिए। लेकिन तुमने जो बात लिखी है उसको समझना भी ज़रूरी है।

महिलाएँ शोषक क्यों होती जा रही हैं?

मैं समझता हूँ तीन कारण हैं इसके, तीन तलों पर देखेंगे: पहला कल्चरल (सांस्कृतिक), दूसरा आर्थिक और तीसरा पर्सनल (व्यक्तिगत)।

क्या हैं कल्चरल कारण?

देखिए इस देश में एक सांस्कृतिक धारा हुआ करती थी जिसमें महिला के पास भी कुछ कर्तव्य थे, साथ में कुछ अधिकार थे और पुरुष के पास भी कुछ कर्तव्य थे और साथ में कुछ अधिकार थे। अब जो सतही किस्म के लिब्रलिज़्म के और फेमिनिज़्म के प्रभाव पड़े हैं भारत पर उनके कारण कुछ स्त्रियों ने ये मान लिया है कि उनके पास अब कर्तव्य नहीं रहे और पुरुषों के पास अब अधिकार नहीं रहे। और ये एक बड़ी अजीब हालत है, मैं इसको एक कल्चरल वैक्यूम का नाम दूँगा, सांस्कृतिक निर्वात, जिसमें आपके ऊपर परम्परागत रूप से जो कर्तव्य थे, जो ज़िम्मेदारियाँ थीं वो तो आपने छोड़ दी हैं। आपने कहा है कि “वो जिम्मेदारियाँ शोषण का दूसरा नाम थीं तो हम उन जिम्मेदारियों को नहीं मानते, हमारा कोई कर्तव्य नहीं है।”

इसी तरीके से पुरुषों के जो अधिकार थे उन अधिकारों को भी ठुकरा दिया गया है ये कहकर कि उन अधिकारों के कारण ही पुरुष वर्ग शोषण करता था। कुछ हद तक वो बात सही भी है लेकिन नए कर्तव्यों का और नए अधिकारों का कोई साफ फ्रेमवर्क सामने नहीं आया है तो जो पुरानी संस्कृति थी उसमें से बस एक हिस्सा हटा दिया गया है, कौन-सा हिस्सा है हटा दिया गया है? कि “हमारी अब ज़िम्मेदारी नहीं है, हमारे कर्तव्य नहीं हैं। लेकिन हमारे अधिकार जो हैं, एक नारी होने के नाते हमारे जो अधिकार हैं वो अधिकार अभी भी यथावत हैं, अधिकार वैसे ही चल रहे है।”

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org