जब जीवन निरर्थक और लक्ष्यहीन दिखे

प्रश्नकर्ता: कभी-कभी ऐसे हालात आ रहे हैं लगता है कि जो भी मैं इस वक्त कर रहा हूँ, जैसे कॉलेज जाना इत्यादि, यह सभी निरर्थक है, और ऐसा एहसास मुझे अक्सर इसलिए आता है क्योंकि मैं देखता हूँ कि जीवन की दौड़ में सभी मुझसे आगे निकल चुके हैं और मैं ही पीछे रह गया हूँ, हालाँकि मुझे यह नहीं मालूम कि मैं सचमुच कहाँ खड़ा हूँ और मेरे माता-पिता मुझे कहाँ ले जाना चाह रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें सब कुछ निरर्थक कहाँ लग रहा है? तुम्हें दूसरों का आगे निकल जाना अर्थपूर्ण लग रहा है, अपना पीछे रह जाना अर्थपूर्ण लग रहा है, दोस्तों, माँ-बाप इत्यादि की नज़रों में गिरना या बने रहना महत्वपूर्ण…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org