जब असफलता से आत्महत्या का विचार आए

मैं वही पुरानी सीख दे सकता हूँ कि “श्रम करोगे तो जो परिणाम आ रहा है वो बेहतर होगा,” लेकिन गारंटी या आश्वासन कुछ नहीं है, ख़ासतौर पर नौकरी जैसी चीज़ में। अगर कहीं पर रिक्त पद ही दस हैं और उन पदों के लिए आवेदन करने वालों की संख्या एक लाख है, तो मैं तुम्हें ये नहीं कहना चाहूँगा कि ऐसा घनघोर श्रम करो कि तुम शीर्ष दस में आ जाओ, क्योंकि यदि एक लाख लोग कोई परीक्षा दे रहे हैं तो उसमें शीर्ष दस में आने के लिए श्रम ही काफी नहीं होता। बहुत हद तक खेल किस्मत का बन जाता है।

इसके अलावा जिस तरह की हमारी परीक्षाएँ होती हैं, चाहे कॉलेज इत्यादि में और चाहे नौकरी के लिए, उनमें नैसर्गिक प्रतिभा का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। अगर किसी में जन्मजात प्रतिभा है ही गणित की तरफ की, तो उसे गणित में बाज़ी मारने के लिए दूसरों की अपेक्षा काफी कम श्रम करना पड़ेगा, और अब किसमें प्रतिभा है किसमें नहीं है, ये बात संयोग की है। पैदा होते वक्त तुम अपने जींस का, अपने अनुवांशिक गुणों का फैसला करके नहीं पैदा होते। तुम्हें नहीं पता होता कि तुम्हारे देह में किस तरह की व्यवस्था छुपी हुई है, वो तो जन्म लेने के कई-कई सालों बाद धीरे-धीरे परत-दर-परत उद्घाटन होते रहते हैं। तुम्हें पता चलता रहता है, “अच्छा! मेरे शरीर में ये बात है।” कभी कोई बीमारी हो गई पैदा होने के चौबीस साल बाद, उसके बाद जाते हो चिकित्सक के पास तो चिकित्सक बोलता है कि, “अरे! चीज़ जेनेटिक है।” तब तुम्हें पता चलता है, “अरे! मैं माँ के गर्भ से ये चीज़ लेकर पैदा हुआ था।” तो ये सब संयोग है।

श्रम पर तुम्हारा अधिकार है, लेकिन संयोगों पर तो तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। और किसी भी परीक्षा के अंतिम परिणाम में श्रम के अलावा कई अन्य कारक भी होते हैं। श्रम तुम कर सकते हो और बाकी चीज़ें सांयोगिक होती हैं। तो इसीलिए मैंने कहा कि मैं तुमको सिर्फ़ अभीप्रेरित करने के लिए, मोटिवेट करने के लिए इस तरह की बात नहीं बोलूँगा कि मेहनत करे जाओ और एक दिन सफलता ज़रूर तुम्हारे कदम चूमेगी इत्यादि-इत्यादि, क्योंकि ऐसा होता नहीं है। मेहनत आवश्यक होती है पर काफी नहीं होती। जो मेहनत नहीं करेगा वो सफल नहीं होगा किसी परीक्षा में, ये बात तो नब्बे प्रतिशत तय है, पर ये कहना कि जो ही मेहनत करेगा वही प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर लेगा, ये बात ठीक नहीं है। मेहनत नहीं करोगे तो उत्तीर्ण नहीं होगे, ये तो ठीक, पर मेहनत करोगे और उत्तीर्ण हो ही जाओगे, ऐसा कुछ निश्चित नहीं होता।

तो तुम मेहनत करे चलो। मेहनत करे चलो क्योंकि उसी पर तुम्हारा बस है।

अब बचते हैं ‘संयोग’, उनका क्या करें? संयोगों के प्रति बिल्कुल अविचल हो जाओ, अक्रिय हो जाओ। संयोगों के प्रति बिल्कुल अडिग हो जाओ, अनछुए रहो उनसे। जिस भी चीज़ को जान लो कि ये घटना…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org